🌹 निराशा से आशा की और 🌹
एक कदम ग्रुप की भेंट
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छोटी सी वस्तु की भी अहमियत
होती हैं
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दोस्तों,
हम अक्सर किसी भी इंसान,वस्तु,जानवर,पशु,पक्षी आदि की कीमत का अंदाजा नही लगा पाते, हम ये समझते हैं की प्रकृति ने हमे जो उपहार दिए हैं, उन्हें हम जीवन भर कमा कर भी उनका ऋण नही चुका सकते । बस हमारे देखने का नजरिया सकारात्मक होना चाहिये ।जो इंसान सकारात्मक नजरिया रखता उसे कुढ़ा भी खाद लगने लगता,और उसे खेत मे ले जाकर उससे फसल का भरपूर फायदा ले लेता । प्रकृति ने जिसका भी सृजन किया उसके भीतर कोई ना कोई गुण अवश्य दिया , हर इंसान किसी भी वस्तु को अलग अलग नजरिये से देखता हैं, जैसे आग भोजन भी पकाती और घर भी जला देती हैं ।
अगर गौर से देखा जाए तो हम इंसानो ने जो बेकार चीज एक दूसरे के पास पाल रखी हैं वो हैं अहंकार,मद,मोह,लालच,ईर्ष्या आदि । ये सब हमने अपने मन के अंदर खुद उपजाई हैं, जब हम हुए तो ईश्वर ने ये सब नही दिया था । आप प्रकृति ने जो दिया उसकी कल्पना कीजिये और एक बार किसी भी वस्तु की और देखिये की इसमें क्या बुराई या खराबी हैं तो आप पाएंगे की प्रकृति की जहरीली वस्तु से भी किसी नई जीवनदायनी दवा का सृजन होता हैं । एक हम हैं जो खुद सृजन करते हैं अंहकार, मद, ईर्ष्या और इससे क्या होता हैं लढाई,झगड़ा,मौत ।
आइये इसको समझाने हेतु एक पुरातन कथा का सहारा लेता हूँ ।
एक कथानुसार व्यासपुत्र शुकदेव ने राजा जनक से ज्ञान लेने बाद जब उन्हें गुरुदक्षिणा देनी चाही तो जनक ने वह चीज मांगी जो बिल्कुल बेकार हो। शुकदेव हंसे कि क्या-क्या लाएंगे, यह धरती तो बेकार की चीजों से भरी पड़ी है। लेकिन आश्चर्य कि उन्हें इस धरती पर एक भी चीज बेकार नहीं मिली।
मिट्टी की ओर हाथ बढ़ाया तो आवाज़ आई कि धरती का सारा वैभव और संपदा मेरे ही गर्भ में है, फिर मुझे बेकार क्यों समझ लिया?
पत्थर उठाना चाहा तो सवाल उछला कि विशालकाय पर्वतों में क्या मैं नहीं हूं, जो पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों, नदी-नालों को धारण किए हुए हैं? जिस भवन में तुम रहते हो, वे मुझसे से ही बने हैं।
शुकदेव ने कूड़े-कचरे के ढेर पर हाथ लगाया क्योंकि लोग इसे देखकर ही घृणा से मुंह फेर लेते हैं। लेकिन वहां भी आवाज सुनाई दी कि मेरे से बढ़िया खाद धरती पर मिलेगी, जो अन्न, फल-फूल, पेड़-पौधों को प्राणवान ही नहीं बनाती बल्कि फसलों को पुष्ट, परिपाक और मधुर स्वाद भी देती है।
दुविधाग्रस्त शुकदेव पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे कि फिर इस धरती पर व्यर्थ क्या है? सोचते-सोचते आत्मस्थ हो गए। तभी भीतर से एक गूंज सुनाई दी कि श्रृष्टि का हर पदार्थ स्वयं में उपयोगी है। यह हमारा मिथ्या अहंकार ही है जो दूसरे को व्यर्थ या तुच्छ समझता है।
यह ज्ञान होते ही शुकदेव की आंखों में चमक आ गई। वे जनक के दरबार में पहुंचे और कहा कि वे अपना अहंकार दक्षिणा में देने आए हैं। जनक ने यह सुनते ही उन्हें अपने गले से लगा लिया।
यह प्रसंग बताता है कि किसी भी चीज को व्यर्थ या महत्वहीन समझना स्वयं की तुच्छता को प्रकट करना है।
हाल ही में एक शोध भी सामने आया है कि नदियों को मछली-कछुआ जैसे जलचर ही स्वच्छ रख पाएंगे। लेकिन हम उनकी उपेक्षा कर नदियों पर अरबों रुपये खर्च कर रहे हैं, इसके बावजूद वे वहीं के वहीं हैं। अनेक बार प्रश्न आता है कि मक्खी-मच्छर जैसे क्षुद्र कीट-पतंगों और सांप-बिच्छू आदि जहरीले जीवों का धरती पर क्या उपयोग है? इनको मार देने में ही भलाई है। लेकिन ऐसा पूछने वाले भूल जाते हैं कि इसी जहर से जीवनदायी औषधियां भी बनती हैं।
वस्तुतः इस धरती पर छोटा-बड़ा, जहरीला या मधुरता देने वाला जो भी है, सबकी अपनी उपयोगिता है। सबका अपना अर्थ और महत्व है।
निरर्थक कुछ भी नहीं है। व्यर्थ है केवल अपना अहंकार और दूसरों को तुच्छ समझने की दृष्टि। ये वही लोग हैं जो जीवन को सतही नज़र से देखते हैं। दरअसल हम में हर चीज को काबू में करने का अहंकार आ गया है। इस कारण से ही छोटे-बड़े, अगड़े-पिछड़े का फर्क आ गया है और हमारे सामाजिक, राजनीतिक ही नहीं, पारिवारिक संबन्धों पर भी ग्रहण लग गए हैं।
इस प्रकार आप समझ ही गए होंगे की ईश्वर की अप्रीतम देन, धरोहर की देखभाल कीजिये । दोष दुसरो को देने की अपेक्षा अपने भीतर के अहंकार को,ईर्ष्या को, लोभ को खत्म करे ।
यदि आप इस लेख से प्रभावित हैं, और यदि प्रकृति को कुछ देना चाहते हैं तो कृपया एक वृक्ष लगाकर उसकी देखभाल करे । उसने हमे जीवन भर दिया और एक हम हैं जो कुछ पल एक गड्ढा खोदकर सिर्फ 15 मिनिट मे एक वृक्ष को रोपण करके और कुछ समय उनकी देखभाल करके छोटा सा ऋण भी नही उतार रहे ।
प्लीज निवेदन, आवेदन, request, प्रार्थना, गुजारिश जो भी आप समझे एक वृक्ष लगाकर उसकी देखरेख कर प्रकृति का ऋण अवश्य चुकाए ।
धन्यवाद ।
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