Tuesday, August 2, 2016

गझल.......

एक ग़ज़ल:-.......
*
फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी
मैं जहाँ जा के छुपा था वहीं दीवार गिरी
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लोग किस्तों में मुझे कत्ल करेंगे शायद
सबसे पहले मेरी आवाज़ पे तलवार गिरी
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और कुछ देर मिरी आस न टूटी होती
आख़िरी मौज थी जब हाथ से पतवार गिरी
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अगले वक्तों में सुनेंगे दरो-दीवार मुझे
मेरी हर चीख़ मेरे अहद के उस पार गिरी
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ख़ुद को अब ग़र्द के तूफाँ से बचाओ क़ैसर
तुम बहुत खुश थे कि हमसाये की दीवार गिरी..... 
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